सहज प्रवृत्ति का सबटाइप
एनियाग्राम sp8: “बस गुज़ारा है” का असली हिसाब
गुज़ारा: sp8 का नाम यही है, वही शब्द जो हर दुकानदार धंधे का हाल पूछने पर मुस्कुराकर कहता है: बस, गुज़ारा चल रहा है। असली सवाल यह है कि गोदाम भरते हुए यह टाइप 8 दरअसल किस चीज़ की रखवाली करता है। सहज प्रवृत्ति के मामले में नतीजा ढीला हो सकता है; कौन-सा कोड सचमुच आपका है, यह आपकी अपनी कोठरी शायद बेहतर बताएगी।
- सबसे ज़्यादा इस्तेमाल
- उसके बाद इस्तेमाल
- सबसे कम इस्तेमाल
सबटाइप का कोड यह नहीं बताता कि बाकी दो में से कौन उसके बाद इस्तेमाल होती है और कौन सबसे कम इस्तेमाल
01
यह सहज प्रवृत्ति किस चीज़ की रखवाली करती है
- spअपने इंतज़ाम पर ज़ोर
- soपूरे समूह पर ज़ोर
- sxएक ही इंसान पर ज़ोर
करनाल के पास जीटी रोड पर बलविंदर का ढाबा है, और उसके पीछे एक कोठरी, जिसमें तीन महीने का आटा, घी के टीन और डीज़ल के ड्रम रहते हैं। दोपहर में बिजली की कटौती आती है, तो आसपास के ढाबों पर पंखे रुक जाते हैं और रोटियाँ धीमी पड़ती हैं; बलविंदर का जनरेटर दूसरी खटखट में चल पड़ता है। यह कोठरी ढाबे से पहले बनी थी, क्योंकि टाइप 8 से यह नहीं सहा जाता कि उसके चूल्हे का फ़ैसला कोई दफ़्तर करे।
दूध की सोसाइटी की गाड़ी दस साल से रोज़ सुबह पचास लीटर उतारती आई है। एक दिन सचिव बताता है कि नए रूट पर गाड़ी अब एक दिन छोड़कर आएगी, और किसे कितना दूध मिलेगा, यह कमेटी तय करेगी। उसी शाम बलविंदर पास के पशु मेले के लिए निकल जाता है, और परसों सुबह ढाबे के पीछे नीम से दो मुर्रा भैंसें बँधी हैं।
बरसात में नहर का पुल बह गया, और हाईवे का ट्रैफ़िक सात हफ़्ते दूसरे रास्ते से घूमता रहा। उन दिनों करनाल मंडी का लाला बिना पूछे आटा उधार भेजता रहा। रास्ता खुलने के बाद पहले हफ़्ते की पूरी कमाई बलविंदर गल्ले में नहीं रखता: रुमाल में बाँधकर मंडी जाता है और लाला के काउंटर पर रखकर गिनवाता है। लाला कहता है, अगले महीने दे देते। जनरेटर की सर्विस अगले महीने होती है।
02
यह टाइप के आवेग को कैसा रंग देती है
- टाइप का आवेग सहज प्रवृत्ति के रास्ते बाहर निकलता है
- काउंटरटाइप: आवेग खुद अपने ही ख़िलाफ़ मुड़ जाता है
जिस दिन ढाबा खुला था, उस दिन से बड़े तंदूर की आग नहीं बुझी। रात को अंगारे राख में दबा दिए जाते हैं, सुबह माचिस नहीं लगती, और कोने में कोयले की बीस बोरियाँ हर मौसम भरी रहती हैं; पंद्रह पर आते ही नई गाड़ी मँगवा ली जाती है। दिसंबर की रातों में बलविंदर दो बार उठकर राख हटाता है और अंगारों की लाली देखकर ही दोबारा सोता है: टाइप 8 की वासना, जिसे हर चीज़ भरपूर चाहिए, उसके यहाँ इसी आँच को जगाए रखती है।
धंधे का हाल पूछो, तो बलविंदर भी जीटी रोड के हर ढाबेवाले की तरह कहता है: बस, गुज़ारा है। उसके मुँह में यह शब्द कितना ठोस है, यह बेटी की शादी में दिखा। रिश्तेदार गहने गिन रहे थे; बलविंदर ने सोना कम चढ़ाया और बेटी के नाम इतनी एफ़डी करवाई कि वह दो साल अपने दम पर गुज़ारा कर ले, ससुराल में किसी के आगे हाथ फैलाए बिना।
बेटे की शादी में मैरिज पैलेस का कैटरर पहले से तय था। सगाई के अगले दिन बलविंदर अपने तीनों तंदूर ट्रैक्टर-ट्रॉली पर लदवाकर पैलेस पहुँच जाता है, चार कारीगरों के साथ। पाँच सौ मेहमानों के लिए हज़ार लोगों जितनी दाल मक्खनी बनती है, और वह रात दो बजे तक तंदूर के आगे खड़ा रोटियाँ लगवाता है। बचा खाना अगली सुबह ढाबे पर ट्रक वालों को मुफ़्त परोसा जाता है, और हाईवे पर दो दिन उस शादी की बात चलती है।
03
अपने टाइप के बाकी दो सबटाइप से यह कैसे अलग है
- यह पेज
- काउंटरटाइप
so8, एकजुटता
काउंटरटाइपदोनों ट्रक वालों से मोल-भाव नहीं करते: भाव एक बार बोलते हैं, और बात वहीं ख़त्म। हाईवे पर नया ट्रैफ़िक इंचार्ज आता है और ढाबों के आगे खड़े ट्रकों के बहाने हर महीने सेवा-पानी माँगने लगता है। sp8 ज़मीन का पिछला हिस्सा पक्का करवाकर अहाते के भीतर पार्किंग बना लेता है और गेट पर कैमरा लगवाता है: सड़क पर उसका कोई ट्रक नहीं, तो माँगने का बहाना भी नहीं। so8 पट्टी के बारह ढाबेवालों को इकट्ठा करता है, और अगले सोमवार सब एक साथ एसपी दफ़्तर में लिखित शिकायत लेकर बैठे हैं। दबाव ऊपर से आए, तो आपको भरोसा किससे मिलता है: अपने अहाते की हद से, या बग़ल के ढाबेवाले के कंधे से?
sx8, क़ब्ज़ा
रेस्तराँ में न sp8 मेन्यू पढ़ता है, न sx8: दोनों रसोइये को बुलाकर बता देते हैं कि क्या बनना है। सड़क चौड़ी होती है, और दोनों की ज़मीन की एक पट्टी सरकार ले लेती है; मुआवज़ा उम्मीद से बड़ा आता है। sp8 उसी महीने बग़ल का एक किल्ला ख़रीदता है, कोठरी के साथ एक ठंडा गोदाम बनवाता है और बची रक़म ट्रैक्टर की नई ट्रॉली में लगाता है। sx8 पूरी रक़म एक इंसान पर रख देता है: पत्नी का बरसों पुराना सपना, शहर में उसका अपना बुटीक, दीवारों के रंग तक उसकी पसंद के। हाथ में अचानक बड़ी रक़म आए, तो आँखों के सामने पहले क्या आता है: अपनी ज़मीन की अगली मेड़, या किसी एक का चेहरा?
04
क्रम में जगह और सबसे कम इस्तेमाल वाली सहज प्रवृत्ति
- sp/so/sx
- sp
- so
- sx
- sp/sx/so
- sp
- sx
- so
जब यही सहज प्रवृत्ति सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होती है, तब दो क्रम हो सकते हैं
बेटा कनाडा जाना चाहता है; एजेंट बीस लाख माँगता है, और गाँव में सब यह रक़म दो किल्ले बेचकर जुटाते हैं। ज़मीन की बात पर बलविंदर हाथ उठा देता है। बेटा मामा से उधार लेकर जाता है, और अब हर दिवाली पहला फ़ोन मामा के घर से बेटे को जाता है, बलविंदर को नहीं। आत्म-संरक्षण सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हो, तो मेड़ किसी सपने के लिए नहीं खिसकती।
ढाबेवालों की पट्टी में अनकहा समझौता है कि थाली एक दाम पर चलेगी। बलविंदर की थाली में दाल की कटोरी बड़ी होती जाती है, मक्खन का पेड़ा दोगुना, दाम वही, और ट्रक उसी के आगे रुकते हैं। छह महीने बाद पट्टी के सबसे पुराने ढाबे पर ताला लगता है, और बलविंदर उसकी भट्ठी आधे दाम पर ख़रीद लाता है, सौदे पर ख़ुश। सामाजिक सहज प्रवृत्ति इस क्रम में सबसे कम इस्तेमाल होती है, और वासना को यह सौदा भी भरपेट लगता है।
फ़ौज के दिनों का साथी हरदीप बीस साल बाद एक रात के लिए ढाबे पर आता है। बलविंदर उसे बोरियाँ, नया जनरेटर और भैंसों की नस्ल दिखाता है और देर रात तक उसकी थाली भरता रहता है। सुबह बस अड्डे पर हरदीप कहता है कि वह कुछ और कहने आया था, और बस चल पड़ती है। एक-से-एक दूसरे क्रम में सबसे कम इस्तेमाल होती है; वहाँ वासना हर मेहमान को भरपेट लौटाती है, बात अधूरी छोड़कर।
05
टेस्ट क्या दिखाता है
सब साफ़ अलग हुआ: सबटाइप और पूरा क्रम
उसके बाद इस्तेमाल और सबसे कम इस्तेमाल लगभग बराबर: क्रम के बिना सबटाइप
सबसे ज़्यादा इस्तेमाल और उसके बाद इस्तेमाल लगभग बराबर: दो उम्मीदवार
शुरू में ही कह देते हैं: चार नतीजों में से सहज प्रवृत्ति वही है जिसे यह टेस्ट सबसे कम सटीकता से पकड़ता है। करीब हर दूसरे इंसान के अंक पास-पास रह जाते हैं, और तब हम एक के बजाय दो दिखाते हैं। उसके लोगों का चूल्हा ठंडा नहीं पड़ना चाहिए, जो उसके साथ काम करता है उसकी ज़िम्मेदारी उसकी है, परिवार पर उठी उँगली उससे सही नहीं जाती: sp8 अपने लोगों के बारे में ऐसे बोलता है। ज़िम्मेदारी, हिफ़ाज़त और अपनों की ऐसी बातों में सामाजिक सहज प्रवृत्ति की आवाज़ सुनाई दे सकती है। तब नतीजा सामाजिक सहज प्रवृत्ति को ऊँचा रख सकता है, और so8 दूसरे उम्मीदवार के रूप में, या उससे आगे, दिख सकता है।
06
सवाल
भूख लगने पर मिज़ाज इतना क्यों बिगड़ जाता है?
शादी की पंगत में जिसे सबसे आख़िरी पत्तल पर बिठाया गया, उसका ग़ुस्सा पेट से कम, उस लंबी क़तार से ज़्यादा उठता है जिसे पहले परोसा जा रहा है। sp8 में भूख के साथ यह हिसाब भी जाग सकता है कि खाने का वक़्त किसी और की घड़ी से चल रहा है। घर की रसोई की एक चीज़ अपने ज़िम्मे रखिए, जैसे रात की दाल: जहाँ एक कटोरी आपके हाथ से पकती है, वहाँ इंतज़ार किसी की मर्ज़ी नहीं लगता।
कोई मेरी छोटी-सी चीज़ भी बिना पूछे उठा ले, तो इतना ग़ुस्सा क्यों आता है?
भाई बिना पूछे बाइक ले गया, शाम को पेट्रोल भरवाकर लौटा भी गया, फिर भी दिन ऐसे बिगड़ा जैसे कोई बड़ा नुक़सान हुआ हो। संयुक्त घर में यह ग़ुस्सा बदतमीज़ी जैसा दिखता है। sp8 को खलने वाली चीज़ बाइक नहीं, वह चाबी है जिसे किसी और ने बिना पूछे घुमा दिया। एक अलमारी पूरी तरह अपनी रखिए, जिसकी चाबी सिर्फ़ आपके पास हो; तब बाक़ी घर में चीज़ों का घूमना कम खलता है।
पैकेज टूर में तीन वक़्त का भरपूर खाना है, फिर भी चिढ़ क्यों होती है?
पैकेज टूर का होटल sp8 को उस मेहमान जैसा बना देता है जिसे भरी थाली तो मिलती है, पर रसोई में झाँकने की इजाज़त नहीं। थाली जितनी भी भरी हो, चिढ़ इसी मनाही से उठती है। अगली बार बुफ़े वाले होटल की जगह ऐसी जगह चुनिए जहाँ हर चीज़ अलग मँगाई जाए: थाली छोटी होगी, पर हर कटोरी आपके कहने पर आएगी।
किराये के बड़े घर की जगह अपने छोटे घर पर ज़्यादा ख़र्च करना ठीक है?
किराये के घर में हर ग्यारहवें महीने एक नया काग़ज़ बनता है, और उस पर आपकी छत का अगला साल किसी और के दस्तख़त से तय होता है। sp8 को यह हर बार दख़ल जैसा लग सकता है। पहले पहचानिए कि किराये में खलता क्या है: हर साल का नया काग़ज़, या दीवार में कील न ठोक पाने की मनाही। पहला सिर्फ़ अपना घर मिटाता है; दूसरा कई बार लंबी लीज़ से भी मिट जाता है।