सहज प्रवृत्ति का सबटाइप
एनियाग्राम sx8: क़ब्ज़ा, पर ज़मीन पर नहीं
आपके नतीजे में sx8 का नाम क़ब्ज़ा है, यानी वह शब्द जिसे अख़बार अवैध क़ब्ज़े, भू-माफ़िया और बुलडोज़र वाली ख़बरों में छापते हैं। तो फिर जिस एक इंसान पर टाइप 8 की सारी ताक़त टिक जाती है, उसे इससे क्या मिलता है? यह कोड टेस्ट का अंदाज़ा भर है, और हो सकता है टाइप 8 का बग़ल वाला कोड भी आपकी ओर देख रहा हो।
- सबसे ज़्यादा इस्तेमाल
- उसके बाद इस्तेमाल
- सबसे कम इस्तेमाल
सबटाइप का कोड यह नहीं बताता कि बाकी दो में से कौन उसके बाद इस्तेमाल होती है और कौन सबसे कम इस्तेमाल
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यह सहज प्रवृत्ति किस चीज़ की रखवाली करती है
- spअपने इंतज़ाम पर ज़ोर
- soपूरे समूह पर ज़ोर
- sxएक ही इंसान पर ज़ोर
अखाड़े में सुनीता किसी को पीठ नहीं दिखाती: मिट्टी पर पीठ लगना हार है, और टाइप 8 के लिए किसी के नीचे आ जाने से बड़ी हार कोई नहीं। बीस साल की कुश्ती ने यह नियम उसकी रीढ़ में बिठा दिया है। रात को घर पर वही पीठ राजबीर की ओर होती है, जो उसके पुराने कंधे की चोट पर सरसों का गरम तेल मलता है, और सुनीता आँखें मूँदे बैठी रहती है। अखाड़े की लड़कियाँ उस कंधे की चोट का नाम तक नहीं जानतीं।
एक शाम पंचायत घर के बाहर स्कूल का एक मास्टर हँसकर सुनीता से कहता है: सुना है, पहलवान जी पानी से डरती हैं। यह बात पूरे गाँव में सिर्फ़ राजबीर जानता था। सुनीता मास्टर को कुछ नहीं कहती। रात को वह राजबीर से पूछती है कि उस दिन स्टाफ़-रूम में और कौन-कौन था, और अगली सुबह उनमें से हर एक के घर जाकर वह क़िस्सा ख़ुद पूरा सुना आती है, नहर वाले दिन से लेकर आख़िर तक।
राज्य प्रतियोगिता से पहले का हफ़्ता: सुबह चार बजे से लड़कियों की दौड़, दोपहर में दाँव-पेच, शाम को वज़न की जाँच, रात दस बजे तक माँ-बापों के फ़ोन। दिन में एक घंटा बचता है। वह घंटा हर रात छत की मुंडेर पर जाता है, राजबीर के बग़ल में, फ़ोन नीचे रसोई में छोड़कर। नींद उस हफ़्ते साल भर में सबसे कम होती है।
02
यह टाइप के आवेग को कैसा रंग देती है
- टाइप का आवेग सहज प्रवृत्ति के रास्ते बाहर निकलता है
- काउंटरटाइप: आवेग खुद अपने ही ख़िलाफ़ मुड़ जाता है
राजबीर से सुनीता का झगड़ा कभी सुबह तक नहीं टलता: बात बीच में छूट जाए, तो वह रात तीन बजे उसे जगाकर पूरी करती है। सुलह भी उतनी ही बड़ी होती है: अगली सुबह अखाड़े पर ताला, लड़कियों की छुट्टी, और दोनों बुलेट पर सौ किलोमीटर दूर कुरुक्षेत्र के मेले में। टाइप 8 की ज़्यादती, जिसे हर चीज़ उबाल तक चाहिए, यहाँ न झगड़े में कम पड़ती है, न सुलह में।
सुनीता को रसोई से चिढ़ है, फिर भी राजबीर का टिफ़िन सुबह पाँच बजे वही बनाती है, अखाड़े जाने से पहले। सास कहती है कि बेटे का खाना वह बना दिया करेगी; सुनीता हँसकर मना कर देती है, और अगले दिन से टिफ़िन ख़ुद स्कूल के गेट पर देकर आती है, ताकि बीच में कोई हाथ न लगे। सास पड़ोसनों से इसे बहू का क़ब्ज़ा कहती है, और सुनीता ने यह शब्द सुनकर कभी बुरा नहीं माना।
चचेरे भाई की बारात में एक रिश्तेदार नशे के ज़ोर पर राजबीर से कहता है: मास्टर जी, घर में पहलवानी किसकी चलती है, सब जानते हैं। ढोल रुक जाता है। सुनीता भीड़ से निकलती है, उस आदमी का कॉलर पकड़ती है, एक हाथ से उसे ज़मीन से उठा देती है और तब तक नहीं छोड़ती जब तक वह राजबीर से माफ़ी न माँग ले। घर लौटकर राजबीर कहता है कि वह ख़ुद निपट लेता। सुनीता कहती है: पता है।
03
अपने टाइप के बाकी दो सबटाइप से यह कैसे अलग है
- यह पेज
- काउंटरटाइप
sp8, गुज़ारा
दोनों ठेले वाले से मोल-भाव में आख़िरी रुपया भी छुड़वा लेते हैं, और फिर चलते-चलते दस का नोट ऊपर से थमा देते हैं। दोनों की बरसों पुरानी एलआईसी पॉलिसी एक ही महीने पकती है। sp8 पूरी रक़म से खेत के कोने में ट्यूबवेल और सोलर पंप लगवाता है, ताकि पानी के लिए न बिजली का इंतज़ार रहे, न पड़ोसी की बारी का। sx8 उसी हफ़्ते अपने उस एक इंसान का बरसों पुराना क़र्ज़ चुका देता है, उसे बताए बिना, और रसीद उसके तकिये के नीचे रख आता है। ऐसी रक़म हाथ आए, तो वह आपको किस शक्ल में दिखती है: थोड़ी और ज़मीन, या किसी एक के कंधे से उतरा बोझ?
so8, एकजुटता
काउंटरटाइपगाली सुनकर न so8 चुप रहता है, न sx8: जवाब उसी जगह, उसी वक़्त। दोनों दो साल दुबई में काम करके लौटते हैं। so8 के सूटकेस में चालीस छोटे डिब्बे हैं: इत्र, खजूर, घड़ियाँ, हर रिश्तेदार और हर पड़ोसी के लिए एक, और हर डिब्बे में बराबर का सामान। sx8 के सूटकेस की आधी जगह एक ही चीज़ ने घेर रखी है, छोटी बहन के लिए कढ़ाई की कंप्यूटर मशीन, ताकि वह अपना काम शुरू कर सके; बाक़ी किसी के लिए कुछ नहीं, और हवाई अड्डे से वह सीधे बहन के घर जाता है। जगह कम हो, तो आपका सूटकेस किसके हिसाब से भरा जाएगा: हर अपने के लिए एक डिब्बा, या एक इंसान के लिए पूरी जगह?
04
क्रम में जगह और सबसे कम इस्तेमाल वाली सहज प्रवृत्ति
- sx/sp/so
- sx
- sp
- so
- sx/so/sp
- sx
- so
- sp
जब यही सहज प्रवृत्ति सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होती है, तब दो क्रम हो सकते हैं
सुनीता की एक-से-एक सहज प्रवृत्ति सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होती है। खेल विभाग उसे ज़िले की कोच बनाना चाहता है: पक्की तनख़्वाह, पेंशन, सरकारी किट, शर्त इतनी कि वह साठ किलोमीटर दूर ज़िला मुख्यालय में रहे और घर सिर्फ़ इतवार को आए। सुनीता चिट्ठी लौटा देती है। पद उसकी एक जूनियर को मिलता है, और अब उस जूनियर की लड़कियाँ सरकारी जूतों में उतरती हैं, सुनीता की चंदे वालों में।
राजबीर के चालीसवें जन्मदिन पर सुनीता माँ के दिए कंगन सुनार को देकर उसके लिए भारी कड़ा बनवाती है; गाँव में महीना भर उस कड़े की चर्चा रहती है। अगले साल उसके अपने घुटने का ऑपरेशन तय होता है, और अस्पताल पहले पचास हज़ार जमा माँगता है। स्त्रीधन की पोटली ख़ाली है। आत्म-संरक्षण इस क्रम में सबसे कम इस्तेमाल होता है; ज़्यादती को एक चेहरा दिखता है, अगले साल का घुटना नहीं।
पंचायत तीज के मेले में दंगल करवाती है। उसकी बैठकों में सुनीता एक बार भी नहीं जाती: ज़्यादती की सारी शामें राजबीर की हैं। उस साल पंचायत दंगल की तारीख़ ठीक राज्य ट्रायल वाले इतवार पर रख देती है, क्योंकि बैठक में टोकने वाला कोई नहीं था; सुनीता की लड़कियाँ अपने ही गाँव के दंगल में नहीं उतर पातीं। दूसरे क्रम में सामाजिक सहज प्रवृत्ति सबसे कम इस्तेमाल होती है।
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टेस्ट क्या दिखाता है
सब साफ़ अलग हुआ: सबटाइप और पूरा क्रम
उसके बाद इस्तेमाल और सबसे कम इस्तेमाल लगभग बराबर: क्रम के बिना सबटाइप
सबसे ज़्यादा इस्तेमाल और उसके बाद इस्तेमाल लगभग बराबर: दो उम्मीदवार
शुरू में ही कह देते हैं: चार नतीजों में से सहज प्रवृत्ति वही है जिसे यह टेस्ट सबसे कम सटीकता से पकड़ता है। करीब हर दूसरे इंसान के अंक पास-पास रह जाते हैं, और तब हम एक के बजाय दो दिखाते हैं। sx8 अपने बारे में कह सकता है कि उसकी चीज़ें उसकी मर्ज़ी से चलती हैं, कि अपने हिस्से पर वह समझौता नहीं करता, कि घर, लोग और फ़ैसले उसके अपने हैं। सुनीता जैसी किसी के मन में इस “मेरा” के पीछे एक इंसान है, पर हिंदी में “मेरा” घर, खेत और आदमी पर एक जैसा बैठता है, और ऐसी बातें सामान और छत की फ़िक्र जैसी सुनाई देती हैं। इसीलिए आत्म-संरक्षण आगे आ सकता है, या sp8 और sx8 दो उम्मीदवारों की तरह साथ दिख सकते हैं।
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सवाल
रोना सिर्फ़ एक इंसान के सामने ही क्यों निकलता है?
गाँव में तेरहवीं हो, तो सब रोते हैं और sx8 की आँखें सूखी रहती हैं; वही आँखें रात को घर पर एक इंसान के सामने बिना रोके बह जाती हैं। लोगों के बीच आँसू मैदान छोड़ने जैसे लगते हैं। उस एक इंसान के साथ कोई मैदान है ही नहीं, वहाँ जीत-हार कोई नहीं गिनता। एक बात पर नज़र रखिए: वह इंसान भी कभी-कभी आपके सामने रो सके, वरना इस रिश्ते का एक ही पलड़ा भीगता रहेगा।
अपने सबसे क़रीबी को बार-बार परखने का मन क्यों करता है?
जिस पर पूरा बोझ डालना हो, उसकी पकड़ पहले देखी जाती है। जान-बूझकर देर से फ़ोन उठाना, सबसे बुरे दिन का ग़ुस्सा उसी पर उतारना और फिर देखना कि वह लौटता है या नहीं: sx8 में ऐसी परख चुपचाप चल सकती है, और सामने वाले को बस बदसलूकी दिखती है। बनावटी परख की जगह उसे एक असली बोझ सौंपकर देखिए, ऐसा काम जिसमें आपको सचमुच उसकी ज़रूरत हो। पकड़ वहीं दिख जाएगी।
धोखे के बाद उस इंसान से पूरी तरह नाता क्यों टूट जाता है?
sx8 ने भरोसा किस्तों में नहीं दिया था, इसलिए वापस भी किस्तों में नहीं लिया जाता। जिस कुएँ के पानी में एक बार ज़हर मिला, पुराने गाँव उसे छानकर पीने की कोशिश नहीं करते थे, पाट देते थे। कटना आपका हक़ हो सकता है; पर पूरे ख़ानदान को पालों में बाँटना ज़रूरी नहीं। दूसरों को उससे रिश्ता रखने दीजिए: आपका कुआँ तब भी पटा रहेगा।
बड़ी टीम से ज़्यादा दो लोगों की जोड़ी में काम क्यों बनता है?
बैलों की जोड़ी बराबर खींचे, तो गाड़ी सीधी चलती है; दस बैल जोत दीजिए, तो खिंचाव बिखर जाता है। क्रिकेट में भी बड़े स्कोर दो बल्लेबाज़ों की साझेदारी में बनते हैं, जहाँ हर रन पर दोनों को एक-दूसरे की आवाज़ सुननी पड़ती है। sx8 को काम में यही आवाज़ चाहिए। टीम बड़ी ही हो, तो काम को दो-दो की जोड़ियों में बाँटने की माँग कीजिए, और जोड़ीदार ख़ुद चुनिए।